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  • +९१ ९६१६ ७०३ २०९
  • पता
  • रामलला सदन मंदिर, अयोध्या
  • ईमेल
  • info@ramlalasadan.com


संगठन का परिचय

श्री रामलला देवस्थानम ट्रस्ट, अयोध्या

अयोध्या स्थित अनेक मंदिर और मठ श्रीमद्जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी श्री राघवाचार्यजी महाराज के नेतृत्व में कार्यरत है। श्री महाराजश्री वेदों के अभ्यासक एवं मीमांसा के पंडित है तथा स्वयं उच्चविद्याविभुषित है। स्वामीजी का प्रमुख उद्देश्य है की प्राचीन और सांस्कृतिक सनातन धर्म से समाज को परिचित करवाना। अपना समाज वेदों के बताये हुए धर्म के मार्ग पर चले, जिस से उन्हें मिले हुवे मानव जन्म का सार्थक हो। बचपन से ही स्वामीजी को देववाणी संस्कृत भाषा और वेदशास्त्र से लगाव था। उनके नानाजी वै. देवी प्रसाद मिश्र उर्फ़ दामोदराचार्य इन से यह धरोहर प्राप्त हुयी।

स्वामीजी राघवाचार्यजी की विद्वत्ता एवं उनका वेदादिशास्त्रों, व्याकरण का विधिवत अभ्यास देखकर श्रीधाममठ , रामवर्णाश्रम अयोध्या के सर्वराकार श्री जयरामजी महाराज ने १९९९ में श्री स्वामीजी को श्रीधाममठ के सर्वराकार महंत पद पर प्रतिष्ठित किया। इस मठ का पदभार लेने के बाद उनके व्दारा मठ का जीर्णोद्धार, वेदशाला, नंदिनी गोशाला, अन्नक्षत्र और पुरातन मंदिर का जीर्णोद्धार इत्यादि कार्य उनके निर्देशन में सुचारु रूप से कार्यरत है।

संप्रति श्री स्वामीजी निम्न संस्थाओं के सर्वराकार महंत पद पर प्रतिष्ठित है।
१) श्रीधाममठ रामवर्णाश्रम, रामकोट अयोध्या.
२) श्रीरामललासदन मंदिर, अयोध्या.
३) श्रीहनुमान मंदिर, रामकोट अयोध्या.
४) श्रीराम-जानकी मंदिर, रामापुर घाट, कौड़िया बाजार, जिला : गोंडा (उ. प्र.)

हमारा लक्ष्य

शिखर, गोपुरम और मंडपम के साथ, दक्षिण भारतीय मंदिरों की संरचना के अनुसार श्री रामलला सदन का जीर्णोद्धार।
जरूरतमंदों को सेवा और चिकित्सा सहायता। छात्रों को शैक्षिक सुविधाएं, गायों की उचित देखभाल।



हमारे आदर्श

सनातन धर्म और वेदों में पुराने, प्राचीन मंदिरों के जीर्णोद्धार को नए निर्माण की तुलना में अधिक दिव्य माना जाता है।
श्री स्वामीजी का मानना ​​है कि प्राचीन मंदिर हमारी संस्कृति के सिद्ध प्रमाण हैं और उन्हें पुनर्स्थापित करके भक्त वर्तमान समय में प्राचीन आस्था को पाटते हैं।

हमारा दृष्टिकोण

विज्ञान और प्रौद्योगिकी के ज्ञान के साथ-साथ युवा शिष्यों (बटुकों) के बीच वैदिक ज्ञान और सनातन संस्कृति को बढ़ाना।
अयोध्या और दुनिया भर में देववाणी संस्कृत को बढ़ावा देने के लिए हर संभव प्रयास करना।



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